सिंधु या हडप्पा सभ्यता

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वर्ष 1921 में दयाराम साहनी सिंधु सभ्यता के पहले स्थल हड्प्पा की खोज की, इसीलिए सिधु सभ्यता को हड॒प्पा सभ्यता भी कहा जाता है सिंधु घाटी सभ्यता का दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थल मोहनजोदड़ो है। 'मोहनजोदड़ो' का शाब्दिक अर्थ घृतको का टीला है मोहनजोदडो में उत्खनन कार्य 1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में आरम्भ हुआ। यह स्थल इस समय लरकाना जिला, सिंध प्रांत, पाकिस्तान स्थित है 

भारतीय पुरातत्व महानिदेशक ने 1924 ई में सिंधु सभ्यता (कांस्ययुगीन) के खोज की विधिवत घोषणा की। उस समय भारतीय पुरातत्व का महानिदेशक सर जॉन मार्शल था जे. एफ. मैके ने 1927 से 1931 तक तथा जी. एफ. डेल्स ने 1963 में हड़प्पा सभ्यता के मोहनजोदड़ो स्थल में उत्खनन कार्य किया! सिंधु घाटी सभ्यता के करीब 1500 स्थलों का अभी तक पता चला है। इनमें से केवल सात को ही नगर की संज्ञा दी गयी है। ये सातों स्थल - हडप्पा , मोहनजोदड़ो , चन्हुदड़ो , लोथल , कालीबंगा , सुतकांगेडोर एवं सरकोटदा हैं

हड़प्पा सभ्यता का केन्द्र एवं विस्तार :
हड़प्पा सभ्यता का कंद्र पंजाब एवं सिंध (मुख्यतः सिंधु और उसकी सहायक नदियां) में है। यहीं से इसका विस्तार पूर्व और दक्षिण की ओर हुआ है। इसके अन्तर्गत पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सीमात प्रात भी आते हैं। इसका फ़ौलाव उत्तर में मांडा, दक्षिण में दैमाबाद, पश्चिम में सुतकांगेडोर और पूर्व में आलमगीरपुर तक है। यह समूचा क्षेत्र त्रिथुजाकार है। इसका क्षेत्रफल लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर है, जो प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया से बड़ा है। 

मोहनजोदड़ो की खोज सन्‌ 1922 में राखालदास बनर्जी की थी मोहनजोदड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल विशाल स्नानागार है, जो 11.88 मी. लंबा, 7.01 मी. चौड़ा एवं 2.43 मी. गहरा है सर जॉन मार्शल इस विशाल स्नानागार को तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण कहा है 45.71 मीटर लंबी और 15.23 मीटर चौड़ी मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत विशाल अन्नागार थी ! कुओं के लिए फननीदार ईंटों का प्रयोग किया गया है। इन ईंटों की चिनाई इंग्लिश बांड पद्धति से हुई है मोहनजोदड़ो में मातृदेवी की मूर्तियां मिली हैं। मोहनजोदड़ो में हड़प्पा की तुलना में पुरुष मूर्तियां से ज्यादा नारी मूर्तियां मिली है  नारी मूर्तियां राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित कालीबंगा स्थल की खोज ए. घोष ने 1953 में की थी  प्राक्‌ हड़प्पा युगीन जुते हुए खेत और हवन कुण्डों का साक्ष्य कालीबंगा स्थल से प्राप्त हुआ है वह एकमात्र सैंधव शहर लोथल है, जहां से ईंटों के एक कृत्रिम गोदीबाड़े का साक्ष्य मिला है

मोहनजोदड़ो को मृतकों या प्रेतों का टीला कहा जाता है। राजस्थान स्थित कालीबंगा स्थल का अर्थ काले रंग की चूडियां है सिंधु घाटी सभ्यता के विस्तार के कारण स्टुअर्ट पिग्गट ने हड़॒प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां बताया है मोहनजोदड़ो के लोग मुख्यतः भूमध्य सागरीय प्रजाति के माने जाते हैं 
हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को कुंओं, खंभों और नालियों के निर्माण का ज्ञान था, किंतु मेहराब के निर्माण के बारे में नहीं पता था हड्प्पा के लोगों की सामाजिक पद्धति उचित समतावादी थी सिंधु घाटी सभ्यता के खुदाई में मिले अवशेषों में तत्कालीन व्यापारिक और आर्थिक विकास के द्योतक मुद्राएं हैं हड्प्पा काल की मुद्राओं के निर्माण में मुख्य रूप से टेराकोटा द्रव्य का उपयोग किया गया था हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित मॉन्टगोमरी जिले में रावी नदी नदी के बायें तट पर स्थित है

हड़प्पा के टीले के विषय में सर्वप्रथम जानकारी 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने दी थी। इसके पूर्वी टीले को नगर टीला कहा जाता है। पश्चिमी टीले को दुर्ग टीला कहा जाता है हडप्पा में सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान स्थित है, जिसे समाधि आर-37 नाम दिया गया है। इस कब्रिस्तान से जो ताबूत मिला है, वह देवदार लकड़ी का बना है हड्प्पा में अन्नागार गढ़ी से बाहर मिला है, जबकि मोहनजोदड़ो में यह गढ़ी के अंदर है। छह-छह की दो पंक्तियों में निर्मित कुल 12 कक्षों वाले एक अन्नागार का अवशेष में हंड़प्पा प्राप्त हुआ है सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था हड्प्पावासी कपास वस्तु के उत्पादन में अग्रणी थे सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि अज्ञात प्रकार की है हड़प्पावासी चित्रलिपि प्रकार की प्राचीन लिपि का उपयोग करते थे  डॉ. अस्को परपोला, एस.आर. राव, आई. महादेवन आदि ने सिंधु लिपि (Indus Script) का अर्थ निकालने का प्रयास किया है
हडप्पा के लोगों की राजव्यवस्था, जैसा कि वस्तुपरक साक्ष्य से प्रमाणित होता है, कुलीनतंत्रीय थी हड्प्पा सभ्यता के औजार और हथियार अधिकतर ताम्र, टिन तथा कांस्य  बने होते थे सिंधु घाटी सभ्यता के समय वजन और माप की संख्या 16 थी (सिंधु सभ्यता के बाटों की तोल में अनुपात 1, 2, 4, 8, 16, 32 आदि का था। संख्या के आधार पर कहा जा सकता है कि 16 इकाई वाले बाट सबसे ज्यादा प्रयोग होते थे) 
मोहनजोदड़ो की जल-निकास प्रणाली अद्भुत है। यहां से ईंट बनाने का भट्ठा, घरों में सीढ़ियां, कपास, पत्थर के लिंग आदि मिले हैं। कांस्य की नर्तकी की प्रतिमा मिली है  

सिंधु सभ्यता संबंधी प्रमुख कथन 
सिंधु सभ्यता मेसोप्रोटामिया की सभ्यता की देन थी।यह कथन ह्वीलर और गार्डन ने दिया था 
इस सभ्यता का जन्म बलूची वन्य संस्कृतियों के प्रभाव से हुआ कृषक संस्कृतियों के प्रभाव से हुआ! यह कथन फेयरसार्विस ने दिया था
सभ्यता आर्य सभ्यता थी तथा आर्यों ने ही इस सभ्यता का निर्माण किया था। ये कथन लक्षमणस्वरूप पुसाल्कर ने दिया था 
इस सभ्यता के निर्माता द्रविड़ लोग थे। यह कथन आर. डी.बनर्जी ने दिया था

महत्त्वपूर्ण स्थल एवं अवस्थिति
माडा: जम्मू-कश्मीर 
कालीबंगा: राजस्थान
मुंडीगाक एवं शोर्तुगुई: अफगानिस्तान 
मेहरगढ़, सुत्कागैंडोर, सुत्काकोह, बालाकोट, रानाघुंडर्ड: बलूचिस्तान
हड़प्पा, डेरा इस्माइल खान, रहमान ढेरीः पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान)
रोपड़, चक-86, बाडा, संघोल: पंजाब (भारत) 
बनवाली, राखीगढ़ी, मित्ताथल: हरियाणा 
आलमगीरपुर, हुलास: पश्चिमी उत्तर प्रदेश 
लोथल, रंगपुर, भगतरावः कठियावाड़ (गुजरात) 
धौलावीरा, सुरकोतड़ाः कच्छ का रन (गुजरात) 

अहमदाबाद जिले के सरागवाला ग्राम से 80 किलोमीटर दक्षिण में भोगवा नदी के तटपर स्थित लोथल स्थल की खोज 1957 में डॉ. एस.आर. राव ने की थी सागर तट पर स्थित लोथल पश्चिम एशिया से व्यापार का प्रमुख बंदरगाह था लोथल हडप्पा केंद्र के बारे में माना जाता है कि मेसोपोटामिया के साथ सीधा समुद्र व्यापार होता था फारस की मुद्रा से प्रतीत होता है कि लोथल सामुद्रिक व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था लोथल से प्राप्त एक मृदभांड पर ऐसा चित्र बना मिला है, जिसपर पंचतंत्र की कहानी "चालाक लोगड़ी" का रूपांकन लगता है। यहां बत्तख पक्षी का चित्रण सबसे अधिक किया गया है लोथल स्थल पर दरवाजे बगल की गलियों में न खुलकर सामने सड़क पर खुलते थे 

सैंधव सभ्यता के पतन की व्याख्याएं और व्याख्याकार 
महाभयकर बाढ़ की परिकल्पना - रेईक्स, जॉन मार्शल, मैके, एस.आर.राव 
सिन्धु नदी का मार्ग परिवर्तन  - एच.टी. लैमब्रिक 
वर्धित शुष्कता और घग्घर का सूख जाना- डी.पी.अग्रवाल एवं सूद 
बाबर आक्रमण - व्हीलर 
पारिस्थितिकी असंतुलन का सिद्धांत - फेयर सर्विस  
परम्परा बाद में भी जीवित रही  - पौसेल एवं मलिक 
जलवायु परिववन का सिद्धांत - अमलानंद घोष एवं ऑरेलिया स्टाइन
प्राकृतिक आपदा - के.यू.आर. केनेडी 
भूतात्विक परिवर्तन - एंम.आर.साहनी 
प्रशासनिक शिधिलता - जॉन मार्शल 
आरयों का आक्रमण - गार्डन चाइल्ड एवं ह्वीलर

हड़प्पाकालीन वह एकमात्र सिंधु शहर चन्हुदड़ो था, जिसमें नगर दुर्ग का अभाव था मोहनजोदड़ो से 130 किमी. दक्षिण में स्थित चन्हुदड़ो स्थल का उत्खनन 1931 ई. में गोपाल मजुमदार नेतृत्व में हुआ था चन्हुदड़ो एकमात्र स्थल है, जहां से मनके बनाने का कारखाना ओर वक्राकार ईंटें प्राप्त हुई हैं 
हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली स्थल है, जिसकी खोज आर.एस. बिष्ट ने की थी और वहां से पूर्व हड॒प्पा एवं हड्प्पा दोनों ही के सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं 

गुजरात के कच्छ जिले में स्थित एक बन्दरगाह नगर सुरकोतड़ा की खोज वर्ष 1964 में जगपति जोशी की थी
बलूचिस्तान के दक्षिण भाग में द्रास नदी के तट पर स्थित हड़प्पा के पश्चिम की ओर का अंतिम हड॒प्पाई स्थल सुतकागेंडोर है सुतकागेंडोर एक बन्दरगाह नगर था, जहां से मिट्टी की चूड़ियां और चारों ओर पत्थर की दीवार मिली है। 1927 ई. में इसका पता सर ओरियल स्टेन दृारा लगाया था कोटदीजी सिंधु नदी के बायें किनारे पर सिंध प्रांत (पाकिस्तान) में अवस्थित है। इसका उत्खनन फजल अहमद (1953 ) किया! हड्प्पाकालीन स्थल रंगपुर गुजरात के जलवार जिले के भादर में स्थित है, जिसका उत्खनन 1931-53 में माधव स्वरूप वत्स एवं रंगनाथ राव ने किया। यह स्थल भादर नदी के किनारे स्थित है नदी गुजरात के कच्छ के रन में स्थित धौलावीरा सिंधु सभ्यता के विशालतम स्थलों में से एक है। इसका उत्खनन 1990-91 में आर. एस. बिष्ट ने किया था ! 
पंजाब के सतलज नदी के तट पर स्थित हड॒प्पाकालीन स्थल रोपड़ की खोज वाई.डी. शर्मा ने की थी। यहां मानव के साथ कुत्ता को दफनाये जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं  मोहनजोदड़ी की दीवारों की चिनाई में पक्की ईंटों का प्रयोग इंग्लिश बांड प्रद्धति पर किया गया है हड॒प्पा संस्कृति कांस्य युग की थी 
हड्प्पा काल में लोग पत्थरों के औजारों का बहुतायत में प्रयोग करते थे, परंतु उन्हें कांसे के निर्माण का ज्ञान था। कांसा बनाने के लिए तांबा राजस्थान की खेतडी से आता था। इसमें प्रयुक्त टिन अफगानिस्तान से मंगाया जाता था  हड़प्पा काल में टिन के अलावा अफगानिस्तान से सोना व चांदी का आयात किया जाता था  हडप्पा काल में गेहूं और जौं मुख्य फसलें थीं। चावल की खेती के प्रमाण लोथल और रंगपुर इन दो स्थलों से मिले हैं राजस्थान से जौ तथा गुजरात से बाजरा और गेहूं मिले हैं। गुजरात में गेहूं की क्लब ह्वीट तथा भारतीय ड्वार्फ ह्लीट दो प्रजातियां उपजाई जाती थीं ट्रिटिकम कम्पैक्टम और ट्रिटिकम स्फीरोकोकम हड॒प्पा काल में पायी जानी वाली गेहूं फसल की किसमें हैं
हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से छह कतारों एवं छोटे बीजों वाले जौ की प्रजाति प्राप्त हुई है। बढ़िया किस्म का जौ बनवाली स्थल से प्राप्त हुआ है
सिंधुवासियों को सबसे पहले कपास उगाने का श्रेय प्राप्त है। यूनान के लोग इसे फ्लूनू कहते थे ऊंट की अस्थियां सिर्फ कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं। गैंडे का एकमात्र साक्ष्य आमरी से मिला है धातुओं से लघु मूर्तियां बनाने के लिए भ्रष्ट मोम विधि का प्रयोग किया जाता था मुहरें (सेलखडी) हड्प्पा संस्कृति की सर्वोत्तम कलाकृतियां हैं। सीलों पर एक सिंगी जानवर (बिना कूबड़ का सांड़ ), भैंस, बाघ, बकरी और हाथी जैसे जानवरों की आकृतियां उकेरी गयी हैं हट॒प्पाकालीन मुहरों पर मातृदेवी के अंकित चित्र से यह परिलक्षित होता है कि हड्प्पा समाज में महिलाओं की स्थिति काफी अच्छी थी हडप्पा सभ्यता के लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे मातृदेवी के अलावा मुख्य पुरुष देवता पशुपति महादेव (आद्य शिव) थे, जिनको मुहरों में योग की मुद्रा में बेठा हुआ तीन मुखों एवं दो सींगों से युक्त दिखाया गया है हडप्पा सभ्यता में पीपल वृक्ष और डोभ पक्षी को पूजा जाता था। महिलाएं चावल से स्वास्तिक की आकृतियां बनाती थी। कालीबंगा तथा लोधल स्थलों से अग्निवेदी के साक्ष्य मिले हैं सिंधुवासी घड़ियाल जलीय जीव की पूजा करते थे और उसे सिंधु नदी का देवता मानते थे

सिंधु घाटी की प्राचीन संस्कृति और आज के हिंदू धर्म के बीच ऑर्गेनिक संबंध का प्रमाण पत्थर, पेड़ा और पशु की पूजा से मिलता है  हड्प्पा संस्कृति में एकश्रृंगी वृषभ (बैल), वृक्ष और मातृदेवी की पूजा होती थी सिंधु घाटी के लोगों की मुहर में पशुपति भगवान की प्रतिकृति का मुद्रण मिलता था लोथल से युग्म शवाधान के साक्ष्य मिले हैं। ताबूत शवाधान के साक्ष्य हड़प्पा से प्राप्त हुए हैं
मेसोपोटामिया की सिलेंडरनुमा (बेलनाकार) मुहरें लोथल से प्राप्त हुई हैं तौल में 16 या उसके आवर्तकों का व्यवहार होता था, जेसे 16, 32, 64, 160, 320,640। हड्प्पावासियों को माप की रैखिक प्रणाली का जनक कहा जाता है हड॒प्पावासियों ने लेखन कला का आविष्कार किया था। हड॒प्पा लिपि वर्णात्मक ओर चित्रलेखात्मक है। कालीबंगा से बुस्ट्रोफेडन लिपि के साक्ष्य भी मिले हैं, जो दायें से बायें तथा बायें से दायें लिखी जाती थी सुमेरियन लेखों से ज्ञात होता है कि वहां के नगर व्यापारी मेलुहा के व्यापारियों के साथ वस्तु विनिमय करते थे। यहां मेलुहा सिंधु प्रदेश के लिए प्रयुक्त हुआ है जी. एफ. डेल्स का मानना है कि प्राकृतिक विपदा ने इस सभ्यता को उजाड़ दिया। सर मार्टियर व्हीलर इतिहासकार का मानना है कि आरयों के आक्रमण के कारण सिंधुवासी अपनी जमीन छोड़कर भाग गये ! कांसे की बेलगाड़ी तथा इक्का हड़प्पा और चन्हूदड़ो के स्थलों से पाए गये हैं। सड़कों पर बैलगाड़ी के पहियों के निशान बनवाली स्थल से मिले हैं स्वतंत्रता के बाद भारत में हड़प्पा के सबसे अधिक स्थल गुजरात राज्य में खोजे गये हैं  हड॒प्पन संस्कृति के संदर्भ में शैलकृत स्थापत्य के प्रमाण धौलावीरा से मिले हैं हड्प्पा में मिट्टी के बर्तनों पर सामान्यतः लाल रंग का उपयोग किया जाता था वस्त्रों के लिए कपास की खेती का आरंभ सबसे पहले भारत ( हड़प्पावासी ) ने किया! 

उत्तर हड़प्पाकालीन संस्कतियां 

आज भी यह विवाद का विषय है कि हड़प्पा की नगरीय सभ्यता अचानक कहाँ लुप्त हो गयी? माना जाता है कि हड़प्पा की नगरीय  संस्कृति के साथ-साथ चलने वाली ग्रामीण संस्कृतियों में ही यह संस्कृति समाहित हो गयी। इन ग्रामीण संस्कृतियों के विकास का साक्ष्य भारत के अनेक हिस्सों में पाया गया है, जो इस प्रकार हैं-
  • देक्षिण-पूर्वी राजस्थान: इस क्षेत्र मेँ अहाड़ एवं गिलुंद प्रमुख स्थल हैं। वनास नदी घाटी में विकसित होने वाली इस संस्कृति को 'वनास संस्कृति” कहा जाता है। यहाँ से पकी एवं कच्ची ईटों का साक्ष्य तथा पत्थर की दीवारों का साक्ष्य मिला है। यहां से तांबे के प्रचलन एवं चावल तथा बाजरे का साक्ष्य भी प्राप्त हुआ है। 
  • मालवा: कायथा एवं नवदाटोली इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं। यहां से चौकोर एवं वृत्ताकार घर के साक्ष्य, लाल एवं काले मृदभाण्ड, गेहूं, अलसी, मसर तथा चावल का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। 
  • महाराष्टः नासिक, जोरवे, नैवासा, दैमाबाद, सोनेगांव, इनामगांव आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं। यहाँ से आयताकार, वर्गाकार एवं व॒त्ताकार मकान के साक्ष्य मिले हैं। नैवासा से टोटीदार एवं नौतली बर्तन के साक्ष्य मिले हें। दैमाबाद से ताम्र निर्मित रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड़, गैंडा एवं हाथी की आकृतियां प्राप्त हुई हैं। 
  • दक्षिण भारत: कृष्णा एवं तुंगभद्रा को बीच इस संस्कृति का विस्तार पाया जाता है। ब्रह्मगिरि, पिकलिहल, उतनूर, मास्की, संगनकल्लू एवं नागार्जुनकोंडा आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं। 
  • पूर्वी भारतः इस क्षेत्र की बस्तियों में वर्धमान, वीरभूम, मिदनापुर, बांकुरा आदि प्रमुख स्थल हैं। यहां से चावल पर आधारित विस्तृत ताग्रपाषाणिक संस्कृति मिली हैं। 
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