द्वैध॒ शासन पद्धति

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द्वैध॒ शासन पद्धति एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था है, जिसको तहत दो तरह की व्यवस्थाओं द्वारा शासन किया जाता है। इसे दो स्वतंत्र  प्राधिकारियों द्वारा सत्ता का संचालन भी कहा जा सकता है। द्वैध॒ शासन के सिद्धान्त का प्रतिपादन ब्रिटिश सम्पादक लियोनेल कार्टिस ने किया। बाद में यह सिद्धान्त 1919 ई. को भारतीय शासन विधान में लागू किया गया, जिसके अनुसार प्रांतों में द्वैध शासन स्थापित हुआ। वैसे भारत में सबसे पहले द्वैध शासन बंगाल में 1765 ई की इलाहाबाद संधि के अंतर्गत लगाया गया था। इसको तहत भू-राजस्व वसूलने का अधिकार ईस्ट इंडिया कम्पनी के पास था, जबकि प्रशासन बंगाल के नवाब के नाम से चलता था। द्वैध शासन पद्धति के अनुसार प्रांतों में शिक्षा, स्वायत्त शासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक निर्माण, कृषि तथा सहकारिता आदि विभागों का प्रशासन मंत्रियों को हस्तांतरित कर दिया गया। ये मंत्री प्रांतीय विधानसभा के निर्वाचित सदस्य होते थे और विधानसभा के प्रति उत्तदायी होते थे। दूसरी ओर राजस्व, कानून, न्याय, पुलिस, सिंचाई, श्रम तथा वित्त आदि विभागों का प्रशासन गवर्नर की एक्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों को लिए सुरक्षित रखा गया था। ये सदस्य गवर्नर द्वारा मनोनीत होते थे और उन्हीं के प्रति उत्तदायी होते थे, विधानसभा के प्रति नहीं। ऐसी स्थिति में प्रातीय विभागों को खर्चे को लिए एक्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों का मुंह देखना पड़ता था। इस शासन पद्धति को गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1935 में भी शामिल किया गया, जिसके तहत केन्द्र में भी इसको लागू करने की व्यवस्था की गयी। लेकिन 1935 का नया शासन विधान कभी पूर्णतया लागू नहीं किया जा सका। स्वतंत्रता के बाद भारत का नया संविधान बनने को बाद पुराने शासन विधान ओर द्वैध शासन पद्धति का स्वत: ही अंत हो गया। 

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